इन पंक्तियों के लेखक ने वह दिन भी देखा है जब राजशाही के पतन के बाद संविधान सभा/पहले आम चुनाव हो रहे थे। जीत का ऐलान होने के बाद माओवादी नेता प्रचंड को उनके ऑफिस से लेकर काउंटिंग स्थल तक उत्साहित कार्यकर्ताओं के घेरे में लाया गया और एक नायक जैसा उनका अभिनंदन हो रहा था लेकिन देखते-देखते हालात इतने बदल गए कि आज युवाओं की अनियंत्रित भीड़ ने उनके घर में भी आग लगा दी। आखिर यह सब कैसे हुआ। कुछ बातें तो बड़ी स्पष्ट हैं।
यद्यपि इस पूरे घटनाक्रम में। ट्रिगर प्वाइंट तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगाया गया प्रतिबंध बना।लेकिन ऐसा लगता है कि यह युवाओं के अंदर, जिन्हें Gen Z कहा जा रहा है, यह अपनी जीवन स्थितियों को लेकर चरम हताशा में उठाया गया कदम है। एक ओर युवा चरम बेरोजगारी में जीने के लिए अभिशप्त हैं, दूसरी ओर तमाम दलों के नेता और नेतापुत्र अय्याशी कर रहे हैं। वे जनता द्वारा दिए गए टैक्स से बने देश के खजाने को लूट रहे हैं।
आज सवाल यह है कि नेपाल यहां से आगे बढ़ेगा या फिर पुरानी राजशाही की ओर लौट जाएगा। दूसरी ओर इस पूरे प्रकरण में विदेशी ताकतों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली से भारत के संबंध कुछ खास अच्छे नहीं रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद आमतौर पर पहला दौरा लोग भारत का करते रहे हैं लेकिन के पी शर्मा ओली ने पहला दौरा भारत का न करके चीन का किया। जाहिरा तौर पर चीन के साथ जिस तरह के तनाव के रिश्ते भारत के रहे हैं, भारत की सरकार के मन में ओली सरकार के प्रति सद्भावना होने का कोई खास कारण नहीं है।
दूसरा कारक कुछ राजनेताओं की व्यक्तिगत रुचि का भी है मसलन नेपाल से सटे गोरखपुर के नेता रहे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी की भी हिन्दू राष्ट्र नेपाल की राजशाही की पुनर्स्थापना में खास रुचि रही है। इसके अलावा अमेरिका की रुचि भी इसमें स्वाभाविक है, एक तो जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगाई गई है वे सब अमेरिका में based हैं। जाहिरा तौर पर उनके आर्थिक हित भी जुड़े हुए हैं। इसके अलावा जिस चीन को अमेरिका अपना दुश्मन नंबर एक मानता है उसकी ओर नेपाल का झुका होना भी अमेरिका को स्वीकार नहीं होगा। लेकिन जाहिरा तौर पर बाहरी कारक तभी प्रभावी हो सकते हैं जहा आंतरिक कारक बदलाव के लिए परिपक्व
हों। इसलिए मूल बात तो नेपाली नौजवानों की बेरोजगारी भ्रष्टाचार और लोकतंत्र के सिकुड़ते स्पेस से पैदा बेचैनी ही है। बार-बार उन्हीं नेताओं के प्रधानमंत्री बनने और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने के कारण युवाओं की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। ओली अपने हाथ में सत्ता को केंद्रित करते जा रहे थे।इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी का संविधान ही बदल दिया। पहले संविधान के अनुसार 70वर्ष की उम्र के बाद कोई किसी पद पर नहीं रहेगा।लेकिन ओली ने इसमें अपने लिए छूट की व्यवस्था करवा लिया।
यह बहुत कुछ हमारे देश में भाजपा में मार्गदर्शक मंडल जैसा मामला लगता है, जहां अन्य नेताओं के लिए तो 75वर्ष वाला फॉर्मूला लागू हुआ लेकिन मोदी पर वह लागू नहीं होने जा रहा है।इसके अलावा भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले प्रचंड सहित वर्तमान प्रधानमंत्री से लेकर तमाम पूर्व प्रधानमंत्रियों पर थे। लेकिन भ्रष्टाचार की जांच के लिए अपने जिस pet नौकरशाह को ओली ने बैठा रखा था,वह किसी भी मामले में सजा नहीं दे रहा था। इसके अलावा सोशल मीडिया से रोजगार भी मिल रहा था। उसके बंद होने से लोगों का रहा सहा रोजगार भी चला गया।
कुछ-कुछ ऐसा ही कुछ महीनों पहले बांग्लादेश में हुआ था जहां से युवा विद्रोह में घिरी शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा और भारत में शरण लेनी पड़ी थी। हालांकि दोनों में एक बड़ा अंतर यह है कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी आबादी है और बांग्लादेश की कट्टरपंथी विरोधी पार्टी युवाओं का सहयोग कर रही थी इसलिए कई जगह हिंदू अल्पसंख्यकों और उनके मंदिरों पर भी हमले हुए। नेपाल में ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं है। वहां कोई धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं हैं। नेपाल में दरसल युवाओं का आक्रोश किसी इस या उस दल के खिलाफ न होकर पूरे राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ है।
इसीलिए वहां न सिर्फ सत्ताधारी मंत्री, CPNUML और नेपाली कांग्रेस के नेता युवा आक्रोश के शिकार हुए बल्कि विरोधी दल के नेता प्रचंड आदि भी उसकी जद में आ गए।ठीक इसी तरह पहले श्रीलंका में विद्रोह हुआ। चरम भ्रष्टाचार में डूबे सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ हुए जनविद्रोह के फलस्वरूप वहां के तत्कालीन शासकों को पद छोड़ना पड़ा और भागना पड़ा।जबकि वे परिवार अल्पसंख्यक तमिल अलगाववाद को कुचलने वाले हीरो थे।बहरहाल वहां के समुद्र मंथन से एक वामपंथी दल जनता विमुक्ति पेरुमुना बड़ी ताकत बनकर उभरा और
उसके नेता दिसानायके देश के राष्ट्राध्यक्ष बने। नेपाल मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा इसमें अमेरिका की संभावित भूमिका को चिन्हित करते हुए लिखते हैं कि, “अमेरिका ने नेपाली सेना में घुसपैठ शुरू की और गणराज्य बनने के बाद यह काम बड़ी तेजी से हुआ, लेकिन अमेरिका के घुसपैठ पर आम तौर पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। अगर इस तरफ प्रचंड का ध्यान दिलाया गया तो इसे उन्होंने बहुत हल्के में लिया। एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार नेपाली सेना के 200 से भी ज्यादा अधिकारी अमेरिका के लाभ भोगी हैं और यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है।”
वे कहते हैं “नेपाल में माओवादियों की सफलता और समूचे देश में वामपंथ की लहर से प्रतिक्रान्तियों का सरगना अमेरिका दहशत से भर गया। अगर पड़ोस में चीन नहीं होता और नेपाल कोई लैटिन अमेरिकी देश होता तो वह बहुत पहले अपने सैनिक यहां उतार देता। उसने चाहा था कि नेपाल को भी इंडोनेशिया की हालत में पहुंचा दे पर हो नहीं सका। उसने बड़े धीरज के साथ उचित समय का इंतजार किया।”
वे कहते हैं,” 2008 के बाद से अब तक के 17 वर्षों में सत्ता के शिखर पर बैठे राजनेताओं के तौर-तरीकों ने, उनके भ्रष्टाचार ने और जनता की बुनियादी मांगों के प्रति उनके उपेक्षापूर्ण व्यवहार ने इन नेताओं और जनता के बीच ऐसी दूरी पैदा की जिसे पाटना असंभव लग रहा था. केपी ओली हों या शेर बहादुर देउबा–दोनों में कौन ज्यादा भ्रष्ट है यह तय करना मुश्किल है लेकिन प्रचंड का इस कतार में शामिल होना अत्यंत त्रासद है। बेशक इन दोनों की तुलना में प्रचंड को कम भ्रष्ट कहा जाता है। पर प्रचंड तो एक विचारधारा से बंधे कम्युनिस्ट नेता थे। उनके साथ भ्रष्ट विशेषण लगना इन दोनों के भ्रष्टाचार की तुलना में कई गुना ज्यादा हो जाता है।”
बहरहाल युवाओं के अकूत बलिदानों के बल पर प्राप्त गणतंत्र की हर हाल में रक्षा करनी चाहिए और इसे राजशाही और हिन्दू राष्ट्र की ओर लौटने तथा अमेरिकी साम्राज्यवाद की गोद में जाने से हर हाल में बचाना चाहिए।
(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ पूर्व अध्यक्ष हैं।)